घर बेघर

घर,आजकल कुछ सूना सा है,पर धीरे धीरे सूनापन इसे अपना ही लेगा,कुछ दिन की ही बात है,फिर घर के हर कोने में,मकड़ी का जाला मिल जाएगा,चलो किसीका तो घरबसा रहेगा,क्यूंकि,मेरा घर और ये जीवनकुछ बंजर, कुछ बेजान,घर की दहलीज और आंगन सा,कुछ अधूरा, कुछ टूटा,मेरी नींद और सपनों सा,तुम्हारा ना होना,इस घर को औेर मेरे…

पूछता है मांझी

पूछता है मांझी भी,समंदर के भवर में नाव को फंसा के,के इस नाव का माझी कौन?यूं तो मैं हूं,जो दिन रात इस नाव को चलाता हूं,जब मेरे हाथों से दर्द टपकता है,और मेरे आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है,तब भी मैं इसकी पतवार नहीं छोड़ता,यूं तो तुम हो,मेरे इस नाव के खीवैया,ये चलती है…

वक़्त की शाख

टूटा था जो पत्ता वक़्त की शाख से, चुराया था छाँव ने जिसे आफ़ताब से, लो वही पत्ता अब धरती को छू किस्सा बन गया, जहाँ से आया था, उसी के ज़मीर का हिस्सा बन गया, छुपा कर आँचल में जिस पेड़ ने सहारा दिया था, हर सांस में वो जिस पेड़ के लिए जिया…

सच बताना

मेरे अधूरे से कुछ सवालों को, अपने जवाबों से पूरा कर जाना, दिल पर हाथ रखकर, होठों पर मुस्कान रखकर, आंखों में विश्वास रखकर, खामोशियों में आवाज़ रखकर, बस अब तुम लफ़्ज़ों को, अपने यौवन से सजा कर सुनाना, मेरे हर असमंजस से घिरे निर्णय पर मैं चाहे जो सुनना चाहूं, मुझे बस सच बताना।…

किरदार बदलते रहते हैं

कभी पलक झपकते ही, कभी दशकों तक साथ निभाते हैं, हर उलझी ज़िन्दगी की कहानी में, बस किरदार बदल जाते हैं, हर पलटते पन्ने से, कुछ बातें बदल जाती है, किस्से भरकर हमारी यादों में, वो कहानी आगे बढ़ जाती है, कुछ हमसे दूर कुछ हमारे पास, अपनी अपनी भूमिका निभाते रहते हैं इस गोल…