पूनम का चांद

इस पूनम के चांद को‌ देखते हो, कैसे अपनी बाहें खोल चांदनी बिखराता है, मानो पूरे जहां को अपने आगोश में समा लेगा, सच कहो तो सदियों से ही, पूरी दुनिया इसके छांव में ही बसती है, इसकी मुस्कान को देखते हो, जैसे किसी मेहबूब ने दुनिया से छिपकर, अपनी मेहबूबा का दीदार किया हो, … Continue reading पूनम का चांद

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आज की सुबह कुछ गुनगुनी सी थी

कल जो सूरज डूबा था, उसकी कुछ किरणे छिपा के रख ली थी, मधुर आवाज़ उन्न पंछियों की, और कुछ फूलों कि गंध भी चख ली थी, रखके सहर के चूल्हे पर, एक पतिला भर के आस से, उबालता हूं मद्धम आंच पर, सुलगा के अपनी सांस से, फिर इमामदस्ते में कूट कर, इलायची सी … Continue reading आज की सुबह कुछ गुनगुनी सी थी

बाबा कहते थे मैं उनकी प्यारी सी एक चिड़िया हूं।

नटखट नन्ही चुलबुली बुलबुल जैसी बिटिया हूं, बाबा कहते थे मैं उनकी प्यारी सी एक चिड़िया हूं, कि मैं चेहचाहाती हूं तो घर खिलखिलाता है, कि मै चुप हो जाती हूं तो घर वीरान हो जाता है, कि मै मल्हार गाती हूं तो मेघ कोई बरस जाता है, सुनने को पंछियों का खिड़की पर तांता … Continue reading बाबा कहते थे मैं उनकी प्यारी सी एक चिड़िया हूं।

चिट्ठियों वाला प्यार।

इस बहती गंगा की मजधार में, उल्टा तैरना चाहता हूं, इस लव- शव वाले ज़माने में, मैं इश्क़ लडाना चाहता हूं, इस दौड़ती हुई दुनिया को मैं रुक कर महसूस करना चाहता हूं, मैं आज के ज़माने में भी चिट्ठियों वाला प्यार करना चाहता हूं, इस ब्रेकअप पैचअप के ज़माने में मैं रूठना मनाना चाहता … Continue reading चिट्ठियों वाला प्यार।

सफर अंजाम तक पहुंच गया।

Following poem is made with a feeling of emotional connect being broken at the time of farewell. ( यह कविता विदाई समारोह के समय टूटते बंधन को दर्शाते हुए बनाई है) एक अधूरा सा खत झांकता है, बन्द किताब के नीचे से, कुछ यादें टपक जाती हैं, उन्ही पन्नो के पीछे से, याद पहले दिन … Continue reading सफर अंजाम तक पहुंच गया।

एक दरख़्त की दास्तां।

Click here to watch this poem being recieted by the poet himself. चलो चलें, फिर से उन्ही बीते दिनों में, यादों की शमा की लौ से पिघले हुए मोम के कतरों को आओ फिर खुरेदें, वही ताबूत जो तुर्बत है कई संस्कारों का, वो ज़माना कई संस्कृतियों की क़ुर्बत का, बची हुई जो महक है … Continue reading एक दरख़्त की दास्तां।

वफ़ा-ए-बेल और तुम।

जैसे कोई बेल धीरे धीरे घुमते घूमते एक सीधे खम्बे पर लिपट कर चढ़ जाती है, तुम्हारी खुमारी भी कुछ इसी तरह चढ़ी थी, फर्क बस इतना था की तुमसे अलग, बेल उस खम्बे को बन्दिशों में बाँध खुद आज़ाद नही घूमती, उस खम्बे को सीढी समझ पैरों से रौंद कर ऊपर नही चढ़ती, और … Continue reading वफ़ा-ए-बेल और तुम।

अब वो गली काफ़ी छोटी हो गयी है।

क्या तुम्हें याद हैं वो गलियाँ पुरानी, नाव चलाते थे जिसमें, जब भरता था पानी, जिसमें खुलते थे आशियानों के दरवाज़ेे, जिसमें बेचने आते थे गुब्बारे और बाजे, जहाँ एक चौखट पर अम्मा बैठ कहानी सुनाती, जहाँ नटखट एक टोली बचपन की यादें बनाती, जहाँ लैला मजनू सैर सपाटे में दिख जाते थे, जहाँ होली … Continue reading अब वो गली काफ़ी छोटी हो गयी है।

ऐ बारीशों के मौसम तुम बड़े याद आते हो।

पतझड़ के फूलों को अपनी खुशबू दे जाते हो, ऐ बारीशों के मौसम, तुम बिन बताये क्यों चले जाते हो? धीमी सी वो खुशबू को तुम सौगात बनाकर लाते हो, उन बारिश की बूंदों को तुम पढ़ा-लिखा कर लाते हो, छूते ही धरती के आँचल को, यूँ गुम सी हो जाती हैं, जो जीवन अब्र … Continue reading ऐ बारीशों के मौसम तुम बड़े याद आते हो।