दरिया प्यासा

सहर से है दरिया प्यासा, एक आरज़ू लगाए बैठा है, कि कब चांद चढ़े, कि कब तुम आओ, की कब तुम अपना अक्स इसमें झांको, और कब ये तुम्हें देखकर, घूंट घूंट भर के, अपनी इस बेबुनियाद सी ज़िद को, रस्म का नाम देकर अदा करे, तुम्हारा नाम रट रट के, खुद का नाम भुलाए…

अंदाज़ा नहीं था

अंदाज़ा नहीं था, की ऐसे दिन की भी दरकार होगी, जब तुम्हारी याद बेशुमार होगी, के तुम सामने बैठोगे हमारे, और हमारी नज़रें भी ना चार होंगी, ना ही वो इश्क़ का सुलगता धुआं उठेगा, ना ही रात भर सुलगती चांदनी साथ होगी, बस एक सन्नाटा सा बसरेगा हमारे बीच, ना उंगलियों, ना आंखों, ना…

बस तुम ही नहीं

गजरे के फूलों की खुशबू, मर्तबान में चंद बेसन के लड्डू, दीवारों पर तुम्हारे मेंहदी के हाथ, बिस्तर की सिलवटों भरी रात, आंगन में तुलसी की क्यारी, वो तस्वीरों में मुस्कुराहट हमारी, शीशे पर लगी हुई बिंदी लाल, कंघे पर कुछ उलझे हुए बाल, आले में रखी वो सिंदूर की डिब्बी, अलमारी में रखी आलते…

घर बेघर

घर,आजकल कुछ सूना सा है,पर धीरे धीरे सूनापन इसे अपना ही लेगा,कुछ दिन की ही बात है,फिर घर के हर कोने में,मकड़ी का जाला मिल जाएगा,चलो किसीका तो घरबसा रहेगा,क्यूंकि,मेरा घर और ये जीवनकुछ बंजर, कुछ बेजान,घर की दहलीज और आंगन सा,कुछ अधूरा, कुछ टूटा,मेरी नींद और सपनों सा,तुम्हारा ना होना,इस घर को औेर मेरे…

पूछता है मांझी

पूछता है मांझी भी,समंदर के भवर में नाव को फंसा के,के इस नाव का माझी कौन?यूं तो मैं हूं,जो दिन रात इस नाव को चलाता हूं,जब मेरे हाथों से दर्द टपकता है,और मेरे आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है,तब भी मैं इसकी पतवार नहीं छोड़ता,यूं तो तुम हो,मेरे इस नाव के खीवैया,ये चलती है…